तिबत्ती पौराणिक कथाएँ [श्री कैलास-मानसरोवर]

तिबत्ती पौराणिक कथाएँ

 

                                                श्री कैलास – मानसरोवर

श्री प्रणवानंदजी्ने अपनी ‘कैलास-मानसरोवर’ नामक पुस्तिकामें लिखा है कि तिबत्ती भाषामें कैलास पुराणके दो अध्याय है । प्रथम अध्याय कैलासके उत्तरीय मठ ‘डिरफुक गोम्पा’मे और दूसरा अध्याय दख्खनके ‘गेङटा गोम्पा’में प्रकाशित किया गया है । वह ‘कङरी करछङ्क’के नामसे प्रसिद्ध किया गया ।

हिन्दुओं मान्यता अनुसार शिवपार्वती श्री कैलास पर बिराजमान है लेकिन बौद्धोकी मान्यता अनुसार भगवान बुद्ध अपने पांचसो बोधिसत्वोके साथ श्री कैलास पर बिराजमान है । इसी कारण हिन्दुधर्मी और बौद्धधर्मी, दोनोके लिये श्री कैलास पवित्र है ।

तिबत्ती पौराणिक कथा अनुसार श्री कैलास संपूर्ण भूमँडलके मध्यमें पहियेके धूसरकी तरह स्थित है और वह गगनको चिरकर अपने स्थान पर सु्शोभित है । कथा अनुसार श्री कैलास सुवर्ण और रत्नोंसे भरा है । श्री कैलासके पूर्वीय छोर स्फटिकसे, दक्षिण छोर नीलमसे, पश्चिम छोर माणिकसे और उत्तरीय छोर सुवर्णसे भरा हुआ है । कथा अनुसार श्री कैलासके शिखर पर सुगंधित पुष्प और औषधियाँ है एवंम शिखर पर जानेवाले मार्गमें कल्पवृक्ष है जो अमरत्व प्रदान करता है । श्री कैलास शिखरके उत्तरीय भागमें कुङ्लुङकी खाई [valley]में एक प्रकारकी औषधी होती है जिसको खानेसे पूरे संसारको देख सकते है । इसी आशंकासे भगवान बुद्धने इसी खाईको चारों ओरसे अपने पैरके नीचे दबा रखा है जिस कारणसे यक्षगण इस औषधिको स्वर्ग नही ले जा सके [श्रीकैलासकी चारों और बुद्धके पैरके निशान है] । इसी तरह नागलोग इस औषधिको पातालमें लेके जा न सकें इसलिये भगवान बुद्धने श्री कैलासको जँजीरोंसे बाँध रखा है । श्रीकैलासके अधिष्ठाता देव [रक्षा करनेवाले देव] ‘देम छोक’ है जो ‘पावो’के नामसे जाने जाते है । वे व्याघ्रचर्म और मूँडनकी माला पहनते है । उनके एक हाथमें त्रिशूल है और दूसरे हाथमें डमरू रहता है । उनके चारों ओर कई देवगण रहते है ।

‘देम छोक’की बगलमें ‘खडो’ या ‘एकाजती’ नामक देवी बिराजमान है । श्री कैलास शिखरकी दक्षिण छोरमें वानरराज ‘हनुमानजी’ बिराजमान है । इनके इलावा कैलास मानसरोवर पर बाकीके सभी देवगण रहते है । यह सभी देवगणके दर्शन सिर्फ उच्च आत्मा और उच्च स्तरीय लामाको ही हो सकता है । श्रीकैलास शिखर पर कई प्रकारकी आवाज़े सुनाई देती है ।

एक बार राक्षसतालके राजा गोंबोफेंङ सिर्फ तीन डगरमें भारत आकर भगवान बुद्धकी सुवर्णमूर्ति राक्षसतालमें लाने हेतु कैलास पहोंच गया । श्रीकैलासको गोंबोफेंङ राजाने चारों ओरसे रस्सीसे बांध दिया एवम उसको उठानेका प्रयत्न किया । इस बातको भगवान बुद्धने अपनी दिव्य दृष्टिसे जान ली और अपने पाँचसो बोधिस्त्वोके साथ हँसका रूप धारण करके वायुपथसे सेरशुङ पहोंच गये । वही जगह पर मानवस्वरूप धारण करके नयनरम्य नृत्य किया । यह नृत्य देखकर राजा गोंबोफेंङ मोहित हो गया । रातभर अपने कंधो पर रखे हुए कैलासको सुबह होते ही नीचे रख दिया । इसी परिस्थितीको भाँप कर भगवान बुद्धने सुबह होते ही कैलासको चारों ओरसे अपने पैरके नीचे दबाकर राजा गोंबोफेंङको शाप दिया और वह शीला बन गया। पर्वत गोंबोफेंङ इसी राजाका पथरीला स्वरूप है । श्री कैलासके पर जो रेखाएँ दिख रही है वह राजा गोंबोफेंङ्ने बांधी हुई रस्सीके निशान है । हिन्दुधर्मी यह निशानको रावणने बाँधी रस्सीके निशान मान रहे है ।

ऐसा माना जाता है कि कैलास और दोर्जेदन [बुद्धगया]के बीच ९ पर्वत अभी भी दिखते है ।

तिबत्ती कैलास पुराणके अनुसार एक मछली भारतमें आकर एक सरोवरमें ऐसे प्रवेश किया जैसे कोई बच्चा अपनी माँकी गोदीमें बैठ जाता है इसीलिये यह सरोवरका नाम ‘छो मफम’ एवम ‘छो मवङ’ [मानसरोवर]के नामसे माना जाता है । इस ‘छो मवङ’की चारों ओर वृक्षकी सात सात पंक्तियाँ है और उसके मध्यमें बड़ा भवन है जिसमें नाग राजा निवास करते हैं । यह सरोवर धनुषके आकारका है । यह भवन मध्यसे ऊठा हुआ है वहीं पर एक विशाल वृक्ष है । इस वृक्ष पर मीठे फल होते है उसको नागराजा खा जाता है और जो नीचे पानीमें गीरता है वह नीचे जाकर सोना बन जाता है। इस फलके गिरने आवाज़ ‘जम’सी आती है । इस वृक्षके अगल बगलमें भूमंडल है इसको हिन्दु पुराणमें ‘जम्बुद्विप’ कहते है और तिबत्ती पुराणमें ‘जंबुलिङ’ कहते है ।

मानसरोवरके दक्षिणके छोर ‘ठुगोल्हो’के [गोम्पा] पास सोना, चांदी, तांबा [copper], नीलमणी [पीरोजा] और मोती जैसी मूल्यवान पाँच धातुसे बना जल है । पूर्वीय छोर सरेलुङ [गोम्पा]के पास सोना,चांदी,नीलमणी,मूंगा और लोहे जैसी मूल्यवान धातुसे बनी हुई ‘पंचरेत’ नामक रेत पडी हुई है जो ‘चेमानङा’के नामसे प्रसिद्ध है। दक्षिण छोरके तट पर यह पँचधातुके अलावा शंख है और उत्तरीय छोरके पर इसी पाँच प्रकारके पथ्थर है।

मानसरोवरके पश्रिममें लङचेन खंबब यानी हस्तिमुख नदी [सतलज],जिसका जल शीतल है और इस जलको पीनेवाले हाथी जैसे बलवान होते है और उसकी रेत सोने जैसी होती है। मानसके उत्तरमें सिहंगी खंबब यानी सिंहमुखी नदी [सिंधु नदी] है जिसका जल गरम है जिसको पीनेवाले शेरकी तरह शूरवीर होते है और उसकी रेत वज्रमयी होती है। पूर्वकी छोरमें तमचोक खंबब यानी अश्वमुखी नदी [ब्रह्मपुत्र] है जिसका जल ठंडा है जिसको पीनेवाले बलवान होते है और जिसकी रेतमें नीलम है। दक्षिणकी छोरमें मप्या खंबब यानी मयूरमुखी नदी[करनाली] है जिसका पानी उष्ण है जिसको पीनेवाले मयुरकी तरह मयुरकी तरह सुंदर होते है और उसकी रेत रजतमयी है। यह चारों नदीयोंकी पाँचसो उपनदीयाँ है। यह नदीयाँ कैलास मानसरोवरकी सात बारपरिक्रमा करनेके बाद सिंधु नदी कैलासकी पूर्वकी ओरसे नीकलकर उत्तरकी ओर बह्ती है। करनाली नदी कैलासकी उत्तरकी ओरसे नीकलकर पश्रिमकी ओर बहती है। ब्रह्मपुत्र नदी कैलासकी पश्रिमकी ओरसे नीकलकर दक्षिणकी ओर बहती है। सिंधु नदी कैलासकी दक्षिण ओरसे नीकलकर पूर्वकी ओर बहती है। इन चारों नदीयोंका उगमस्थान मानसरोवरकी सीधी रेखाकी ४५ माईलकी अंदर ही है इसी लिये तिबेटीयन पौराणिक काव्यमें बहुत ही सत्य है।

सौजन्यः-
कैलास मानसरोवर
लेखकः-
स्वामी प्रणवानंदजी
श्री कैलास मानसरोवर तीरवासी

 

ॐ नमः शिवाय

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