मानो या ना मानो

                     આજે અષાઢ સુદ તેરસ                                            

                                      Me in MANSAROVAR                June 2010

 

  मानो या ना मानो

એક સત્ય ધટના

                         

२२ जून २०१० के रोज में और सुधीर कैलास मानसरोवरकी यात्रा करके वापस आयें. सुधीर हंमेशा अपने ऑफिसके सभी अम्प्लोयर और सभी भक्तोंको मानसरोवर और अष्टपदका जल प्रसादीके रूपमें देते हैं. ईसबारभी सबको दिया

अष्टपदके जलकी बात कहें तो

अष्ट्पद एक ऐसा स्थल है जहाँसे पवित्र कैलास पर्बतके अदभूत दर्शन होते है और जैनधर्मके प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव यहाँ आठ स्टेप भरकर कैलास पहोंचे थे. ये आठ स्टेप्स क्या है ये भी जानीये.

हमारे पौराणिक कथाओमें पुष्कर विमानका उल्लेख हुआ है जिसमे बैठकर देवो देवियाँ प्रवास कर सकते थे. ऐसे ही पुराने जमानेमें लोगोंके पास ऐसे साधन थे जिससे वे १२ जोजन तक प्रवास कर सकते थे. ऐसे ही ऋषभदेवने ९६ जोजनका प्रवास करके कैलास पहोंचे होंगे और इसी कारण यह स्थल अष्टपद माना जाता है. इसको मान्यता देते हुए ६ शिखर मौजुद है. इसी जगह पर ऋषभदेवका निर्वाण हुआ था. यह स्थल बहुत ही पवित्र माना जाता है.

इसी स्थलसे उमा छु नामकी नदी बहेती है जो हंमेशा कैलासजीको अभिषेक करती हुइ बहेती है. इसीलिये उसका जल भी अतिपवित्र माना जाता है.

अब हुआ यह कि हमारी ऑफिसके एक एम्प्लोयर दिलिपभाईके बडेभाईका अचानक ६१की आयुमें देहांत हो गया और दिलिपभाई अपनी माता सुमित्राजीको लेकर अपनें गाँव खेडब्रह्मा चले गये. वहाँ जाकर अपने पुत्रका देहांत सुनकर सुमित्राजीको इतनी चोट लगी कि वे कोमामे पहोंच गये. यह देखकर दिलिपभाईको दुःख हुआ कि माँको किस तरह सँभाले ? १५ दिन हो गये फिरभी सुमित्राजीकी हालत ऐसीकी ऐसी ही रही. यह देखकर सभी गाँववाले दिलिपभाईको सलाह देने लगे और बताने लगे कि सुमित्राजीको गँगाजल पीलाया जाय. दिलिपभाईभी सबकी सलाह मानकर सुमित्राजीको गंगाजल पीलाने लगे. अचानकसे दिलिपभाईको सुधीरने दिये हुए मानसरोवरका जल और अष्टपद जल याद आया. दिलिपभाई जैन धर्मी है तो उनको अष्टपदके जलमें और हमारी कीहुई यात्रामें बहुत ही श्रद्धा थी. उन्होंने अपनी माँको ये दोनो जल पीलाने चालु कीया.

अचानकसे दिलीपभाई देखा कि सुमित्राजीका मुँह खुलने लगा और जैसे जैसे सुमित्राजी यह जलका स्वीकार करते गये तो वे धीरे धीरे कोमामेंसे बहार आने लगे. यह देखकर दिलिपभाई और सारे परिवारवालोंकी खुशीका ठिकाना न रहा.
जैसे जैसे गाँववाले सुनते गये वैसे वैसे सभी गाँववाले सुमित्राजीकी देखनेको आने लगे और सोचने लगे कि प्रभुका ये कैसा चमत्कार है !!!!!!!

यह एक घटना नहीं हुई और कितनी घटना हुई है जिसको सुनकर हमको इसके प्रभावको मानने मजबूर कर देता है. वैसे मैं भी कैलास मानसरोवरकी यात्रा आठ की है लेकिन ऐसी घटना पहेली बार देखी और सुनी. मेरी तो यह यात्राकी श्रद्धा और बढ गई है.

दुसरा किस्सा यह हुआ कि

हमारे एक दोस्त राजेशभाईकी ऑफिस भी हमारी ऑफिसके नज़दिक ही है. उन्हें भी मासरोवरका जल प्राप्त हुआ था और उन्होंने अपनी ऑफिसमें यह जलका छिंटकाव किया और देखो नतीजा क्या नीकला!!! ऑफिसके अटके हुए सभी काम फिरसे चालु हो गया. राजेशभाई मानसरोवरका जल ओर भी लेकर गये और अपने घरमें भी जलका छिंटकाव किया यह आशासे की अपने घरसे जो तनाव रहता है वो दूर हो जाये. एक अच्छी घटनासे कितनी श्रद्धा बढ जाती है !!!!!!!!

                         ૐ નમઃ શિવાય

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3 comments on “मानो या ना मानो

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